संत श्री देवाराम जी महाराज जीवनी – Sant Shri Devaram ji maharaj Jivan Prichay

shri devaram ji maharaj

Shri Devaram ji maharaj Biography And Wiki

पूरा नामसंत श्री देवाराम जी महाराज
पिता श्री काग हराराम जी
माता श्रीमति धनीबाई
जन्मश्रावण सुदी 14, सवंत 1972
समाधि आषाढ सुदी 2, सवंत 2053
जन्म स्थानजोधपुर की वर्तमान लूनी तहसील के गांव दुन्दाड़ा
गादीपती ‘गुरु गादी’ के प्रथम उत्तराधिकारी शिकारपुरा धाम

Shri Devaram ji maharaj jivan Prichay

जोधपुर जिले के एक गांव के एक बालक के पांव खराब हो गए, जिस कारण वह चल ही नहीं पाता था। उसके पिता बेबस से उसे देखते और परेशान होते रहते। समय बीतता गया और बालक सात वर्ष का हो गया। तभी किसी शुभ घड़ी में एक सज्जन ने बालक के पिता को परम पूज्य प्रातः स्मरणीय अलौकिक संत श्री राजाराम जी महाराज की शरण में जाने की सलाह देते हुए कहा ‘राजाराम बापजी साक्षात् भगवान् का अवतार हैं और दीन दुखियों के कष्टों को हरने वाले हैं। तुम अपने लाचार बेटे को उनके पास ले जाओ इसके पांच जरूर ठीक हो जाएंगे। एक बार श्रद्धा और विश्वास के साथ जाकर देखो तो सही।’

बालक को लेकर पिता शिकारपुरा स्थित आश्रम में उपस्थित हुए और चरण वंदना कर ‘बापजी’ को अपना दुखड़ा कह सुनाया। महाराजश्री के नेत्रों में बालक के प्रति दया का भाव प्रकट हुआ। बालक के पिता ने उसे पूज्य राजाराम जी महाराज की सेवा में समर्पित कर दिया और वापस लौट गए।

महाराजश्री के उपचार एवं कृपा से बालक धीरे-धीरे ठीक होने लगा। जब उसके ठीक हो जाने की खबर पिता को लगी तो वह अपने वचन से फिर गया और बालक को वापस घर ले गया। कुछ दिनों बाद बालक के पांव पूर्व अवस्था में आ गए और वह एक बार फिर चलने फिरने से लाचार हो गया। उसके पिता को सद्बुद्धि आई और वह उसे पुनः आश्रम ले गए और क्षमा याचना कर बापजी’ की शरण में दे दिया। पूज्य राजाराम जी महाराज ने कृपा की और बालक को अपनी सेवा में ले लिया। धीरे-धीरे उसके पांव लगभग पूरी तरह सक्रिय हो गए। इस बालक ने अपनी सेवा और श्रम के बल पर ‘बापजी’ का दिल जीत लिया। आगे चलकर यही बालक पवित्र ‘गुरु गादी’ का सुयोग्य उत्तराधिकारी बना और ‘देवाराम जी महाराज’ के नाम से विख्यात हुआ।

संत श्री देवाराम जी महाराज जन्म, जन्म स्थान, माता-पिता और बचपन

राजस्थान के जिला जोधपुर की वर्तमान लूनी तहसील के गांव दुन्दाड़ा में काग घरी एक साधारण कलबी किसान हराराम जी की धर्मपत्नी श्रीमति धनीबाई ने आवण सुदी १४ संवत् १९७२ को एक शिशु को जन्म दिया, जिसका नाम बड़े प्यार से देवाराम रखा गया। धनीबाई जिला जालौर की आहोर तहसील के गांव बरवा के खीमाराम जी बग की इकलौती संतान थी।

हराराम जी के पिताश्री तुलछाराम जी पहले बाडमेर जिला की सिवाना तहसील के गांव रामपुरा के खेड़ा में निवास करते थे। स्वाभिमानी तुलछाराम जी का किसी बात को लेकर रामपुरा के सामन्तों से मनमुटाव हो गया, जिसके बाद उन्होंने वहां रहना उचित नहीं समझा और सदैव के लिए रामपुरा को छोड़कर दुन्दाड़ा में आकर बस गए थे। दुन्दाड़ा में इस परिवार ने अपने सदाचरण, सद्व्यवहार और श्रम के बल पर अपना एक विशेष स्थान बना लिया था। रामपुरा से पलायन कर आने वाला यह परिवार अपने बूते हुन्दाड़ा में प्रतिष्ठित हो गया।

हराराम जी और धनीबाई को परमात्मा ने दो पुत्र रत्न पहले ही वरदान स्वरूप प्रदान कर रखे थे जिनके नाम क्रमशः गुलाराम और रावतराम था, ये दोनों ही देवाराम से बड़े थे। चूंकि देवाराम सबसे छोटे थे इसलिए उन्हें पूरे परिवार का भरपूर प्यार मिलता था। बालक देवाराम को अपने भाईयों के साथ तरह-तरह के खेल खेलना और अपनी माता की गोद में बैठना बहुत अच्छा लगता था।

shri devaram ji maharaj

जब भी मौका मिलता देवाराम धनीबाई की गोद में जाकर बैठ जाते और माता का प्यार पाते। अनेक बार ऐसा भी होता जब माता धनीबाई अपने लाड़ले बेटे को झिड़क देती थीं लेकिन ऐसा तभी होता था जब उन्हें कोई बहुत जरूरी काम करना होता था और देवाराम उनकी गोद में जाकर बैठ जाते थे।

अपने पिता हराराम जी के कंधे पर चढ़कर बैठ जाना और उनसे अपने साथ खेलने की जिद करना देवाराम को बहुत प्रिय था। पिता को भी अपने बेटे की शरारतें अच्छी लगती थीं। हराराम जी धार्मिक विचारों के परम आस्तिक किसान थे उन्हें भगवान कृपा पर पूरा भरोसा था। वह चाहते थे कि उनके तीनों पुत्र संस्कारवान बनें, शिष्टाचार युक्त हों। यही कारण था कि हराराम जी जब भी समय मिलता अपने तीनों पुत्रों को पास बिठाकर उन्हें अच्छी-अच्छी बातें बताते और समाज की ऊंच-नीच समझाते।

एक दिन हराराम जी ने बच्चों को समझाया- ‘प्रातःकाल नींद खुलते ही भगवान् का स्मरण अवश्य करना चाहिए और सोते समय भी प्रभु नाम का स्मरण कर सोना चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है सबसे पहले तो दिन भर चित्त प्रसन्न रहेगा और दूसरी बात रात में बुरे सपने नहीं आएंगे।’

इसी तरह उन्होंने बच्चों से यह भी कहा- ‘सदा प्रसन्न रहना चाहिए। कष्ट में, रोग में भी खुद को खुश रखो। कष्ट में दुखी होने से कष्ट और बढ़ता है जबकि खुश रहने से कष्ट कम हो जाता है, पीड़ा घट जाती है। इसलिए हर परिस्थिति में खुश रहना चाहिए खुश रहने वालों को भगवान् बहुत प्यार करते हैं।’

जब हराराम जी बच्चों को अच्छी-अच्छी बातें बता रहे होते तो उनका ‘देवा’ उनकी गोद में बैठा तरह-तरह की शरारतें कर रहा होता। वैसे भी इन सब बातों कोसमझने के लिए अभी वह छोटा भी तो बहुत था – मात्र दो वर्ष का एक दिन ‘देवा’ ने मिट्टी खा ली तो मां ने उन्हें फटकार लगाई और हल्का सा चपत गाल पर भी जड़ दिया। इस बात पर ‘देवा’ पूरे दिन रोते रहे, न उन्होंने कुछ खाया और न पिया बस रोते रहे। संध्याकाल में मां धनीबाई ने सुबकते हुए ‘देवा’ को अपनी गोद में उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और उसे फिर कभी न मारने की कसम खाई तब कहीं जाकर ‘देवा’ का मन शांत हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ‘देवा’ बहुत ही भावुक एवं संवेदनशील थे।

माता का निधन और लकवे की मार

देवाराम जी के पिताजी हराराम जी का जीवन सुखपूर्वक बीत रहा था हराराम जी काश्त की खेती किया करते थे  और अपने परिवार को पालते थे लेकिन संवत 1975 में क्षेत्र में एक महामारी ने भयंकर रूप धारण कर लिया, जिसकी चपेट में आकर हरा राम जी की पत्नी धनी भाई के प्राण पखेरू उड़ गए और उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।  हराराम जी के 3 पुत्र थे तो तीनों को पालने तथा खेती करने का सारा  काम अब हराराम जी का रह गया था अपनी मां के निधन के बाद देवाराम जी तथा इनके भाई गुला राम और रावत राम  आपस में प्रेम भाव से रहते थे यह अपने पिताजी के लिए रोटी बनाकर भी रखते थे और इनके पिताजी जब घर आ कर खाना खाते तो काफी प्रसन्न होते थे।  Shri Devaram ji maharaj बचपन से ही दयालु भाव के थे। यह कुत्तिया को खाना खिलाते तथा दूध पिलाने का काम करते थे। 

इसी तरीके से इनका परिवार हंसी खुशी अपनी जिंदगी जी रहा था लेकिन तभी अचानक संवत 1968 को जेठ माह में देवाराम जी के शरीर को लकवा हो गया, उनकी नाभि के नीचे का पूरा शरीर बेकार हो गया और काम करना बंद कर दिया।  सारे दिन उछल कूद करने वाला देवा अब बिना पावों के चल नहीं पाता था जिससे पिताजी को काफी ज्यादा दुख होता था और वे रोते रहते थे और भगवान को दोष देते थे उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वे अब क्या करें।  देवाराम जी के पिताजी ने काफी प्रयास किए और काफी उपचार करवाएं, लेकिन कोई भी फर्क नहीं पड़ा।  लेकिन देवाराम जी अपने पिताजी से हमेशा कहते थे कि मैं 1 दिन ठीक हो जाऊंगा, आप घबराओ मत। तब इनके पिताजी ने इनको शिक्षा दिलाने का सोचा क्योंकि इन्हें किसी ने बताया था कि विद्या अंधे की लाठी होती है शिक्षा की इस बात को सोचते हुए हरा राम जी ने श्री सवाराम जी श्रीमाली की पाठशाला में देवाराम जी को पढ़ाई के लिए भेज दिया,  सुबह देवाराम जी के पिताजी ने स्कूल छोड़ने जाते थे और छुट्टी के टाइम लेने जाते थे यही दिनचर्या चलती रही।  स्कूल के अध्यापक देवाराम जी के शैक्षिक प्रगति से काफी ज्यादा संतुष्ट थे।

श्री राजाराम जी की शरण मे आने का सोभाग्य

उस समय राजारामजी महाराज के उपचार और अमृत उपदेशो की चर्चा जगह-जगह पर हो रही थी और इन्हीं उपचार से ठीक हुए कुछ लोगों ने हरा राम जी को राजारामजी महाराज के बारे में बताया और कहा कि आप अपने पुत्र को वहां पर लेकर जाओ, यह बिल्कुल ठीक हो जाएगा।  हराराम जी ने अपने पुत्र को कंधे पर बैठाकर देव झुलनी ग्यारस के दिन शिकारपुरा राजारामजी महाराज के पास लेकर आ गए, उस दिन काफी ज्यादा भीड़ थी और मेला था। हरा राम जी और देवा भी मेले का हिस्सा बन गए और सारा दिन कैसे निकल गया पता ही नहीं चला और शाम के समय में हराराम जी ने  देवाराम जी को कंधे पर बैठाकर राजारामजी महाराज के सम्मुख उपस्थित हुए और अपना सारा दुखड़ा राजारामजी को सुनाया। 

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पूज्य राजारामजी महाराज हराराम जी का दुखड़ा तो सुन रहे थे लेकिन उनकी दृष्टि सामने बैठे देवा राम जी महाराज पर थी और जैसे ही  हराराम जी की बात समाप्त हुई, राजारामजी महाराज ने कहा कि तुम्हारे तो दो बेटे ही काफी है इसे मुझे दे दो।  अगर इसके भाग्य में होगा तो यह ठीक हो जाएगा, नहीं तो मेरे पास रहकर भगवान का नाम रटता रहेगा और राम नाम का जप करता रहेगा।  तुम बेफिक्र होकर अपने घर वापस लौट जाओ।  हराराम जी पुत्र मोह के कारण काफी सोचने लगे तो इन्हें  बाद अपने गांव में मिले साधु की भविष्यवाणी याद आ गई, तब जाकर इन्होंने देवाराम जी को राजारामजी महाराज को सुपुर्द कर दिया और कहा कि मुझे तो गौरव की अनुभूति हो रही है कि राजारामजी महाराज ने मेरे पुत्र को अपनी शरण में ले लिया है मैं धन्य हुआ मेरा कुल धन्य हुआ। 

उसके बाद देवाराम जी के पिताजी वापस अपने घर आ गए और रात को जब यह सो रहे थे तो उन्हें नींद नहीं आ रही थी यह बार-बार सोच रही थी कि मैंने कहीं कुछ गलत तो नही कर दिया, मेरे बाद मेरे दोनों पुत्र देवा की सेवा कर लेते और यह यहीं पर रहता तो अच्छा होता।  दूसरी तरफ यह भी सोचते कि मैंने अपने पुत्र को महाराज श्री  के शरण में समर्पित कर दिया है तो वह ठीक भी हो जाएगा और भगवान का काम भी करेगा।  इसी तरीके से धीरे-धीरे हराराम जी वापस अपने काम में लग गए और ऐसा कोई भी दिन नहीं था जब हरा राम जी अपने पुत्र देवा को याद नहीं करते हो। 

इसी तरीके से देवाराम जी भी राजा राम जी के सानिध्य में काफी ज्यादा घुल मिल गए और आश्रम मे खेलना कूदना रहता था।  श्री राजारामजी महाराज काफी ज्यादा गहनता से देवा अध्ययन करते थे तब राजा राम जी को लगा कि इस बालक में असाधारण व्यक्तित्व छिपा हुआ है और मात्र 7 दिनों में राजाराम जी ने यह जान लिया था कि यह बालक प्रतिभावान है और अच्छे बुरे का फर्क जनता है साथ ही साथ सेवाभावी भी है तो राजारामजी महाराज ने देवाराम जी की मस्तक को पढ़ लिया था कि यह समाज का नाम उज्ज्वल करेगा।  

आश्रम में आने के आठवें दिन राजारामजी महाराज ने Shri Devaram ji maharaj को एक कड़वी दवाई पिलाई।  इस दवा का असर उनके पूरे शरीर में हो गया और जब सुबह में उठे तो उनके शरीर में जो अवचेतन अंग थे उनका कुछ-कुछ चेतना आना शुरू हो गई थी और यह बात उन्होंने प्रसन्नता के साथ राजारामजी महाराज को बताई।  इसके बाद राजारामजी महाराज ने 4 दिन तक लगातार उन्हें इसी कड़ी दवाई को पिलाया और इस दवा ने अपना असर दिखाया और अगले कुछ दिनों में देवाराम जी महाराज बिल्कुल स्वस्थ और उनका पूरा शरीर लकवे से मुक्त हो गया। 

 इसके बाद देवाराम जी महाराज आश्रम में खेलते, गुरु सेवा करते और कहानियां सुनते थे इसी तरीके से देवाराम जी आश्रम में सबके प्रिय बन चुके थे।  

जब Shri Devaram ji maharaj जी बिल्कुल स्वस्थ हो गए थे और पढ़ाई लिखाई करने लग गए थे तो इस बात का समाचार हराराम जी को भी पहुंचा, इस समाचार को सुनकर हराराम जी काफी ज्यादा प्रसन्न हुए और शिकारपुरा अपने बेटे को पूरी तरीके से स्वस्थ और खुश देखकर वह भी काफी प्रसन्न हुए और उन्होंने राजाराम जी से विनती की, देवा अपने भाइयों से मिलाने के लिए अपने गांव ले जाना चाहता हूं तब महाराज जी ने मना नहीं किया, देवा को अपने पिताजी के साथ भेज दिया।  अपने भाइयों से मिलकर काफी ज्यादा खुश भी हुआ, लेकिन उनके पिताजी उन्हें वापस नहीं भेजना चाहते थे क्योंकि उन्हें पूरी तरीके से पुत्र प्रेम मे बंधे थे  आश्रम से कई बार देवा के लिए बुलावे भी आते थे लेकिन देवाराम जी के पिताजी हराराम जी उन्हें अनदेखा कर लेते थे। 

कुछ समय बाद देवा फिर से लकवा ग्रस्त हो गया, जिस कारण लोगों ने उन्हें कहा कि आपने  महाराज जी के संदेशों को अनदेखा किया उसी का यह परिणाम है और आपने अपने पुत्र को महाराज श्री के चरणो में भेट कर दिया था और भेद की वस्तु को वापस नहीं लिया जाता, आपने अपने पुत्र को वापस लाया उसी कारण यह सब कुछ हुआ है। 

Shri Rajaram ji

इसके बाद राजाराम जी ने हराराम जी के भाई खेताराम जी को कहा कि वह अपने देवा को सवाराम जी की स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दे, कुछ समय वहां पर पढ़ने के बाद देवाराम जी को फिर से शिकारपुरा आश्रम बुलाया गया , जहां पर देवाराम जी फिर से पूर्ण स्वस्थ हो गई उसके बाद देवाराम जी ने संकल्प कर लिया कि वह अब से यहीं पर रहेंगे और गुरु जी के सेवा करेंगे। 

यहां पर रहकर देवाराम जी ने गुरु जी के सानिध्य में शिक्षा हासिल की और अपने समाज के विकास की ओर बढ़ाने के लिए काम किया।  देवाराम जी महाराज ने राजारामजी महाराज के उपदेशों का प्रसार किया और समाज को आगे बढ़ाने का काम किया।

इसी तरीके से समय बीता गया और 16 बरस बीत गए, इतना समय देवाराम जी राजारामजी महाराज के साथ में रहते हुए उन्होंने बहुत ही ज्ञान हासिल किया और उसके बाद राजारामजी महाराज ने समाधि ले ली। जब राजाराम जी महाराज ने समाधि ली तो देवाराम जी ने महाराज श्री के संदेशों को और उपदेशों को जन जन तक पहुंचाने के लिए एक मोन संकल्प ले लिया। समाधि के बाद देवाराम जी महाराज को श्रावण वद 14  को सादर देकर महंत श्री की पदवी से विभूषित किया गया।  अब उनके कंधों पर पूज्य श्री राजारामजी महाराज के दिव्य तथा गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का भार कंधो पर आ गया, इन्होंने समाज के लिए कई काम किए,  समाज को आगे बढ़ाने के लिए तथा गुरु जी के उपदेश को जन जन तक पहुंचाने का काम किया।  

संत श्री देवाराम जी का देवलोकगमन

लगभग सोलह वर्ष तक सद्गुरु अवतारी श्री राजाराम जी महाराज की हृदय से सेवा करने के बाद योग्य शिष्य के रूप में स्थापित होकर उनके उत्तराधिकारी बने संत श्री देवाराम जी महाराज ने ५४ वर्षों तक निरन्तर अपने सद्गुरु के उपदेशों, शिक्षाओं को प्रचार-प्रसार किया। अपनी मेहनत, अपनी योग्यता, अपने व्यवहार, अपने आचरण से लोगों का दिल जीतने वाले महाराजश्री ने न केवल आश्रम का नाम दूर-दूर तक फैलाया बल्कि स्वयं भी एक दिव्य आध्यात्मिक विभूति के रूप में स्थापित हुए।

शिकारपुरा स्थित श्री राजेश्वरधाम में लगभग साढ़े पांच दशक तक महंत पद पर आसीन रहकर समाज का मार्ग दर्शन करने वाले महान संत श्री देवाराम जी महाराज आध्यात्मिक जगत में नये मानदंड स्थापित कर आषाढ़ गदी २ संवत् २०५३ को रात्रि सवा ग्यारह बजे ब्रह्मलीन हो गए। उन्हें समाधिस्थ किये जाने के बाद अपने प्रिय संत को श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। आश्रम में मेले जैसा दृश्य था। हर कोई Shri Devaram ji maharaj के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा में लीन था। सभी लोग महाराजश्री से जुड़ी यादों के बारे में बड़े उत्साह से एक दूसरे को बता रहे थे। …और संत देवाराम जी महाराज वे तो वैकुण्ठ में अपने सद्गुरु श्री राजाराम जी महाराज के परम पावन सान्निध्य में बैठ धर्म-चर्चा कर रहे थे।

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